तमन्ना भाटिया और सिद्धार्थ मल्होत्रा की मच अवेटेड फिल्म ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। बिहार की लोककथा, रहस्यमयी जंगल, वन देवी का मंदिर और छठ पूजा के माहौल को कहानी में शामिल करने वाली यह फिल्म हॉरर और एडवेंचर का मिश्रण पेश करती है।
कहानी की शुरुआत सातवीं शताब्दी से होती है, जहां देवांचल के जंगल में वन देवी का मंदिर है। मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद इस जंगल में जाना मना है। लेकिन एक मजबूरी के चलते राजा रात में जंगल पहुंचता है और यहीं से शुरू होता है एक ऐसा रहस्य, जिसका असर सदियों बाद साल 2026 में भी दिखाई देता है।
फिल्म की सबसे खास बात इसका लोककथा वाला माहौल है। बिहार के गांव, आस्था और आधुनिक सोच के बीच टकराव और जंगल का रहस्य इसे एक अलग पहचान देते हैं। शुरुआत में फिल्म ऐसा एहसास कराती है, जैसे अमर चित्र कथा का कोई पन्ना बड़े पर्दे पर जीवंत हो गया हो।
पहला हाफ कहानी में दिलचस्पी बनाए रखता है, लेकिन इंटरवल के बाद स्क्रीनप्ले थोड़ी कमजोर पड़ जाती है। वन देवी, रहस्यमयी शक्तियां और जादुई बाघ जैसे एलिमेंट्स विजुअली आकर्षक हैं, लेकिन कई जगह कहानी इन्हें जल्दबाजी में आगे बढ़ाती नजर आती है। हॉरर भी बहुत ज्यादा डराने के बजाय रहस्य और रोमांच पर निर्भर रहता है।
सिद्धार्थ मल्होत्रा ने ऋषि के किरदार में अच्छा काम किया है, जबकि तमन्ना भाटिया का किरदार अपेक्षाकृत कम प्रभाव छोड़ता है। सुनील ग्रोवर गंभीर भूमिका में सरप्राइज पैकेज हैं। सिनेमैटोग्राफी, लोक संगीत, छठ के दृश्य और जंगल के विजुअल्स फिल्म की ताकत हैं।
कुल मिलाकर ‘द वन’ में कहानी और लोककथा का मजबूत आधार है, लेकिन कमजोर दूसरा हाफ इसे यादगार बनने से रोकता है। फिर भी फिल्म एक बार देखी जा सकती है और बोर नहीं करेगी।
रिपोर्ट - ज्योति सिंह


